आईडीपीएल हॉकी ग्राउंड के पास झाड़ियों में मिला नवजात, एम्स में भर्ती — मां की तलाश जारी
ऋषिकेश: आईडीपीएल हॉकी ग्राउंड के समीप गुरुवार सुबह एक दर्दनाक दृश्य ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया। झाड़ियों में एक नवजात बच्चा बरामद हुआ, जिसे पुलिस ने तत्काल एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया। नवजात पूर्णतः स्वस्थ बताया जा रहा है, लेकिन उसे वहां किसने और क्यों फेंका, यह अभी भी रहस्य बना हुआ है।
सुबह की सैर में मिली जिंदगी की कराह
गुरुवार सुबह करीब 5:30 बजे, एक व्यक्ति मॉर्निंग वॉक कर रहा था, तभी उसे झाड़ियों से किसी शिशु के रोने की आवाज सुनाई दी। वह जब नजदीक गया, तो देखा कि झाड़ियों में एक नवजात शिशु पड़ा हुआ है। उसने तुरंत चीता पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और नवजात को एम्स के निक्कू वार्ड में भर्ती कराया गया।
डॉक्टरों की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा
एम्स पीआरओ संदीप कुमार ने बताया कि नवजात का जन्म लगभग एक से दो घंटे पूर्व ही हुआ था, यानी जन्म के तुरंत बाद ही उसे झाड़ियों में फेंक दिया गया। सौभाग्यवश, बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है और उसकी देखभाल की जा रही है।
सीसीटीवी खराब, जांच में बाधा
जब पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच करनी चाही तो पाया कि कैमरे खराब हैं। इससे शिशु को फेंकने वाले या जन्म देने वाली महिला की पहचान कर पाना कठिन हो गया है। फिलहाल स्थानीय लोगों से पूछताछ कर जानकारी जुटाने की कोशिश की जा रही है।
कोतवाली प्रभारी निरीक्षक प्रदीप राणा ने बताया कि पुलिस जल्द ही आरोपितों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि “ऐसी अमानवीय हरकत को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।”
पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी हृदयविदारक घटनाएं
यह पहली बार नहीं है जब क्षेत्र में नवजातों को लावारिस हालत में छोड़े जाने की घटनाएं सामने आई हैं:
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29 मार्च 2025: गोविंदनगर के डंपिंग जोन में कूड़े के ढेर में एक थैले में नवजात का शव मिला था। थैला किसने फेंका, यह आज तक पता नहीं चला।
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18 नवंबर 2020: लक्ष्मणझूला-नीलकंठ मार्ग पर गरुड़चट्टी के पास पुलिस को करीब दो दिन का नवजात मिला था। स्वास्थ्य बिगड़ने पर उसे एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया और बाद में शिशु सदन देहरादून भेजा गया।
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सवाल उठते हैं, जवाब मांगता है समाज
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क्या हम इतनी असंवेदनशील हो गए हैं कि नवजातों को यूँ ही मरने के लिए छोड़ दिया जाए?
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क्या महिलाएं ऐसी स्थिति में पहुंच रही हैं जहां उन्हें बच्चे को जन्म देने के बाद भी उसे स्वीकार करने की स्वतंत्रता नहीं मिलती?
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क्या समाज और प्रशासन मिलकर ऐसे मामलों को रोकने के लिए कोई ठोस पहल करेगा?
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जरूरत है जागरूकता और संवेदना की
इस घटना ने एक बार फिर समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम कहां जा रहे हैं। ऐसी घटनाएं न केवल कानून व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने की भी परीक्षा लेती हैं। यह समय है जब हमें संवेदनशीलता के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, महिला सशक्तिकरण और सुरक्षित मातृत्व के विकल्प पर गंभीरता से काम करना होगा।